Friday, July 13, 2018

तुम (कविता)


मैंने सुना,
अलगनी पर बैठी टिटिहरी से तुम्हारी आवाज़
नंगी चारपाई से उठकर, पीछे मुड़कर
मैंने देखा
मेरी पीठ पर उग आये तुम्हारी हथेलियों के रक्तीले चिन्ह
मैंने बनाई
दोपहर की धूप के छिटपुट बादलों से तुम्हारी आकृतियाँ
जुते हुये ऊबड़-खाबड़ सफेद खेतों में
मैंने जाना
महुवे के पत्तों पर तुम्हारा ही नाम सहला रही है
गर्मी की लू
और
मैंने महसूस की
होंठ और जीभ से अन्दर की तरफ यात्रा करती
एक चटकती, रेतीली प्यास
फिर
मैंने तुम्हें पुकारा
और यह हुआ
अभी, हाँ, बिलकुल अभी
टिटिहरी उड़ गयी थी
उन आकृतियों को समेटते हुए
साथ ले गयी लू की तपिश
पीठ और खेत दोनों हो गए समतल
बादलों में भर गया ढेर सारा पानी
चारपाई खुद-ब-खुद चली आई ओसारे में
फिर मैंने छुआ
मड़ई की ओरी से टपकते हुए
तुम्हें...

पेड़ों ने नए इल्म गढ़े पंछियों के बीच (ग़ज़ल)


पेड़ों ने नए इल्म गढ़े पंछियों के बीच
बस्ती बहेलियों की बसी घोसलों के बीच

उनवान था सहराओं में भी फूल खिलेंगे
शोले बरस रहे हैं यहां बारिशों के बीच

मुंसिफ ने हँसके रोटी के मसले पे कहा, चल
चल चाँद दिखाते हैं तुझे बादलों के बीच

उसने उठाये हाथ सवाली मिजाज़ से
शरमा के खुद ही खींच लिए तालियों के बीच

रमुआ ने हाथ जोड़ लिए क़ातिलों के बीच
मैं क्या करूँगा जाके वकीलों, जजों के बीच

मैं साँस ले रहा हूँ ग़ज़ब दहशतों के बीच
सिसकी फँसी पड़ी हो जैसे कहकहों के बीच

खुद को समेट लें तो चलें और कहीं पर
कुछ और धरतियाँ भी होंगी धरतियों के बीच

अहमक़ था मैं, सस्ती सी क़लम ले के आ गया
ऊँचे, अदीब, नामचीन शायरों के बीच

Saturday, April 14, 2018

जय भीम (कविता)


इन्कलाब का नाम ज्योतिबा इन्कलाब है जय भीम
मनूवाद के सब जुल्मों का इक जवाब है जय भीम

पूरब पश्चिम उत्तर दक्खिन एक ख़्वाब है जय भीम
ऊपर नीचे दायें बाएं बेहिसाब है जय भीम

बुद्ध, कबीरा दादू बिरसा संत गाडगे जय भीम
रविदास के बेगमपूरा का शबाब है जय भीम

पेरियार, कर्पूरी ठाकुर, ऊधम सिंह है जय भीम
भगत सिंह शाहू मंडल है लाजवाब है जय भीम

शेख फातिमा सावित्री और ऊदा फूलन जय भीम
महिलाओं की हिस्सेदारी का हिसाब है जय भीम

लोहिया ललई और बाबू जगदेव प्रसाद है जय भीम
कांशीराम की सोशल जस्टिस की किताब है जय भीम

कुछ मत बोलो रामराज है (कविता)


कुछ मत बोलो रामराज है
मुँह मत खोलो रामराज है
आरएसएस की समरसता में
ज़हर न घोलो रामराज है

रेप हुआ है हो जाने दो
पुलिस प्रशासन सो जाने दो
सत्तर साल से सहते आये
ये भी सह लो रामराज है

बोलोगे मारे जाओगे
पाकिस्तां सारे जाओगे
रामलला का रथ निकला है
साइड हो लो रामराज है

भ्रष्टाचार किया तो क्या है
दंगा-मार किया तो क्या है
बीजेपी में शामिल होकर
सबकुछ धो लो रामराज है

सारा मुल्क अजायबघर है
दिल सूखा आंखें बंजर हैं
नफरत की खेती उर्वर है
काट लो, बो लो रामराज है

शिक्षा बेचो नोकरी बेचो
रेल बेच दो पटरी बेचो
तोल के बेचो या फिर चाहे
बेच के तोलो रामराज है

मोदी जी जब पीछे पड़ गए
माल्या नीरव जेल में सड़ गए
काला धन खाते में आ गया
तुम भी ले लो रामराज है.

पीएम जी का ट्वीट हो गया
मित्रों ! सबकुछ ठीक हो गया
तबतक पर्चा लीक हो गया
चैन से सो लो रामराज है

Sunday, March 25, 2018

आज का दिन (कविता)


आज सुबह की धूप बहुत अच्छी है
गुनगुना अहसास देने वाली
मैंने सड़क पर खड़ी गाड़ियों की लम्बी कतारों से गुजरते हुए
उनके शीशे में अपना चेहरा देखा
बिखरे हुए बालों के साथ सुबह की गुनगुनी धूप में
मैं बहुत सुन्दर दीखता हूँ
मैंने एक रिक्शे वाले को सवारी उपलब्ध कराई
एक आदमी को फोटोकापी की दुकान बताई
चाय पीते हुए एक आदमी की सिगरेट जलाई
एक लड़की को स्वस्थ रहने की सलाह दी
अरसे से मेरे पास रखी लाइब्रेरी की दो किताबें लौटाई
ताकि कोई उन्हें पढ़ सके
बेहद खुबसूरत और खुश एक नन्ही बच्ची को
पिता का हाथ पकड़ कर
सड़क पर चहलकदमियाँ करते देखा
आज मुझे पता चला कि
रेहड़ी लगा कर अपने दो बच्चों का पेट पालने वाली
बहुत ही व्यस्त और पसीने से हमेशा तरबतर 
वह साँवली औरत वाकई बहुत खूबसूरत है
मुझे आज पता चला कि मैं दुनियाँ में
हमेशा के लिए रहने नहीं आया हूँ
मैं खुश हूँ कि मैंने आज का दिन जी लिया
25.03.2014

Sunday, March 18, 2018

सबका मालिक एक- मकानमालिक ( पांच लघुकथाएं)

एक
टिंग-टोंग...
ऊपर बालकोनी से आवाज़ आती है “कौन” ?
“जी कमरा चाहिए था.”
“कहाँ से हो ?”
“जी गाजीपुर से.”
“क्या करते हो बेटा ?”
“बी.ए. करने आया हूँ, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से.”
“नाम क्या है ?”
“विनय”
“पूरा नाम”
“विनय आज़ाद”
भौंहे सिकोड़ते हुए... “विनय आज़ाद”... “इतना ही है.”
“जी.”
“टाइटिल क्या लगाते हो ?”
“बताया तो आज़ाद.”
“ये कौन सा टाइटिल है ?”
“जी मुसहर हूँ.”
“तो क्या हुआ ! गलत मत समझना बेटा ! मेरा मतलब वो नहीं था, मैं तो बस ऐसे ही.. क्या मुसहर इंसान नहीं होते ? हम तो ये सब नहीं मानते.”
“कमरा है ?”
“कमरा तो खाली नहीं है कोई. आप ऐसा करो आगे देख लो.”

दो
“और सुनाइये गनेस जी ! क्या हाल चाल है ?”
“सब बढ़िया अंकल ! और बताइये आप कैसे हैं ?”
“बढ़िया ! और पढ़ाई-लिखाई ?”
“बस, परीक्षाएं सर पर हैं, तैयारी चल रही है ज़ोरदार. अच्छा सुनिए ! वो ऊपर वाले जो सक्सेना जी हैं न, उनसे थोड़ा कह दीजिये कि अपना टेप का वैल्यूम थोड़ा धीमे रखा करें. आजकल सुबह उठकर पढ़ाई करते हैं और उनके यहाँ भक्ति गाना बहुत देर तक बजता रहता है तो डिस्टर्ब होता है.”
“ठीक है कह देंगे ! किराया कब तक ?”
“दे देंगे. शाम को देते हैं. डेट तो पूरा हो जाने दीजिये. टट्टी वाला नल नहीं ठीक करवा रहे हैं आप. बहुत धीमे पानी आता है. और तो और कुंडिया ठीक करवाइए न ! मेरा बड़ा वाला सिलेंडर चोरी हो गया है. कल को साइकिल भी ले जायेगा कोई.”
“उसको तो बस करवाने वाले ही हैं. लगे हाथ रंगाई भी करवा देंगे. दीवाली आने में केतना दिन रहिये गया है.”
“ठीक है, हम तो चाय पीने जा रहे थे, चलेंगे ?”
“नहीं आप जाइए, अरे हाँ आपसे एगो बात पूछनी थी.”
“हाँ, बताइये !”
“आपके रूम पर सुने हैं लड़की लोग आता है. आप ही बताइये ये सब गलत है न ! यहाँ और फेमिली भी तो रहता है !”
“फेमिली रहता है तो लड़की लोग नहीं आयेगा ? दोस्त लोग नहीं आयेगा ? इसमें गलत क्या है, बताइयेगा ?”
“लोग ऐतराज करता है. कहता है कि यहाँ पढ़ाई करने आया है या...”
“आपको ऐतराज है कि फेमिली को ? कमरा आपका है कि फेमिली का ? किराया आपको देता हूँ कि फेमिली को ? बुलाइए किसी फेमिली को. मैं बात करता हूँ.”
“अरे नहीं.. मतलब एतना भी दिक्कत नहीं है. कोई-कोई कहता है तो मैं आपसे कह दे रहा हूँ.”
“कहने वालों को कहने दीजिये. आपको ऐतराज हो तो बताइये. बगले में थाना है, रिपोर्ट करा दीजिये कि लड़का के कमरा में लड़की आता है. और यह देश और संविधान के खिलाफ है. मैं भी देखूँ कौन सी धारा लगाते हैं.
“ही ही ही.. आप तो बुरा मान गए गनेस बाबू !”

तीन
“आज नौरात्र है और आप चिकन बना रहे हैं ? पापा से बोल दूंगा.”
“अच्छा आज नवरात्र है ? मैं तो नहीं मनाता, इसलिए मुझे याद भी नहीं रहता.”
“मैं सुबह को पापा से बताऊंगा, कि भईया चिकन बना रहे थे.”
“क्या करेंगे तुम्हारे पापा ?”
“कमरे से निकाल देंगे.”
“तुम लोग चिकन नहीं खाते क्या ?”
“खाते हैं, लेकिन नौरात्र में नहीं.”
“क्या ब्बात करते हो यार ! नौरात्र में तो चिकन बहुत टेस्टी बनता है. खाओगे ?”
“बक्क ! नौरात्र में नहीं खाया जाता.”
“लो टेस्ट करो ! एक बूँद भी पानी नहीं डाला है. गज़ब की खुशबू है.”
“अरे नहीं....”
“लेग पीस है. खाओ तो !”
“ठीक है ! लेकिन पापा से तो नहीं बताएँगे न ?”

चार
“आंटी फ़्लैट चाहिए. ये मेरी दोस्त हैं, इन्हीं को “
“क्या करती हैं ?”
“यूपीएससी की तैयारी.”
“ठीक है. हमारे घर में अच्छे घरों की लड़कियां रहती हैं. आप इन्हें हमारे फ़्लैट में रहने वाली दो और लड़कियों से मिलवा दीजिये. (वो और हम मिलकर तय कर लेंगे कि यह अच्छे घर की लड़की है या नहीं.) और उसके तुरंत बाद सेक्योरिटी मनी, एडवांस रूम रेंट और प्रोपर्टी डीलर का पैसा जमा कर दीजिये. किराया कल से चालू हो जायेगा. लेकिन एक बात का ध्यान रहे- हमारे फ़्लैट में अच्छे घरों की लड़कियां रहतीं हैं.”
“यू नो बेटा ! आपको पहले ही बता दूँ कि अगर हमको किसी भी दिन यह पता लगा कि कोई लड़का उससे मिलने आया है, चाहे उसका भाई ही क्यों न हो, हम उसे उसी वक्त निकाल देंगे, और सेक्योरिटी का पैसा भी नहीं वापस करेंगे, दिन हो या रात, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. वी आर वेरी स्ट्रिक्ट अबाउट दिस. क्योंकि हमारे फ़्लैट में अच्छे घरों की लडकियाँ रहती हैं.”
“ये तो अच्छा हुआ कि आपने बता दिया कि आप उसके भाई नहीं हैं, नहीं तो कैसा ज़माना आ गया है कि लोग किसी भी लड़की को अपनी बहन बोल के फ़्लैट दिला देते हैं और मिलने के बहाने ढूँढते रहते हैं. और हम ये बर्दाश्त नहीं करते क्योंकि हमारे फ़्लैट में अच्छे घरों की लडकियाँ रहती हैं.”
“हमारे उस फ़्लैट में दो और लडकियाँ रहती हैं, दोनों बहुत अच्छे घरों से हैं.”
“बुरा मत मानना बेटा ! ये लड़कियों का ड्रिंकिंग और स्मोकिंग बिहैवियर, आई डोंट लाइक दिस ! हम तो कत्तई अलाऊ नहीं करते. अगर कुछ भी ऐसा है तो पहले से बता दीजियेगा क्योंकि हमारे फ़्लैट में अच्छे घरों की लडकियाँ रहती हैं.”
“आप के लिए कुछ चाय वगैरह बनाऊं ?
“जी नहीं, शुक्रिया.”

पाँच
“कमरा चाहिए था.”
“देख लीजिये, सात हज़ार रुपये किराया है.”
“ठीक है. कमरा तो अच्छा है. बिजली-पानी वगैरह का हिसाब बता दीजिये. फिर परसों तक शिफ्ट हो जाते हैं.
“बिजली पानी मिलाकर आठ हज़ार पड़ जायेगा. एक महीने का सेक्योरिटी और किराया एडवांस. रात को दस बजे गेट बंद हो जायेगा. कमरे को साफ़ सुथरा रखना होगा. टीवी की आवाज़ तेज नहीं आनी चाहिए. हीटर नहीं जलाना है. ज्यादा लोगों का आना जाना नहीं चलेगा.”
“ठीक है. कोशिश रहेगी कि मेरी तरफ से आपको कोई परेशानी न हो. निश्चिन्त रहिये.”
“और सुन लीजिये.. हमारे यहाँ सिगरेट-मांस-मदिरा एलाऊ नहीं है. पिछली बार यादव बोल के कोई एससी रह रहे थे, पांच महीने से. वो तो हमने चिकन बनाते हुए पकड़ लिया और निकाल भगाया. कोई मोरैलिटी नहीं रह गयी है समाज में.”
“जी.”
“इसके पहले कॉलेज का एक लड़का रहता था. शकल सूरत से तो बहुत अच्छा दिखता था. एक दिन किसी लड़की को ले आया. पूछने पर बोला नोट्स लेने आई थी. आते हुए तो हमने देखा नहीं. लेकिन दोनों जोर-जोर से हँस रहे थे तो हमारा माथा ठनका. उसी शाम तक कमरा खाली करवा दिया. पता नहीं कैसी जनरेशन है. देश कहाँ जायेगा !”
“जी.”
“बगल वाले मिश्रा जी के यहाँ एक लड़का रहता था. अजीब सा था. दाढ़ी मूँछ बढाए. कहता था पीएचडी कर रहा हूँ. एक दिन मिश्रा जी को उसकी दो-तीन आरटीआई मिली. सरकार से कुछ हिसाब-किताब माँगा गया था. मिश्रा जी ने उसी वक्त कमरा छोड़ने को कहा तो सवाल-जवाब करने लगा. मैं तो कभी न दूं कमरा ऐसे लोगों को. क्या पता कितने खतरनाक लोग हों. कुछ भी कर सकते हैं. कल को कमरा भी हड़प सकते हैं.”
“जी, बिलकुल.”
“वैसे हम किराए पर कमरा नहीं उठाना चाहते. भगवान का दिया हुआ सबकुछ है हमारे पास. पैसे के भूखे नहीं हैं. लड़की डॉक्टर है, लड़का इंजिनियर. बस चाहते हैं कि इतने बड़े घर में दिया-बत्ती जलती रहे.”
“तो ठीक है, फिर किराया क्यों ले रहे हैं ? दिया बत्ती तो मैं कर ही दूंगा.”
“माफ़ कीजिये, कमरा नहीं है हमारे पास.”

हत्यारे (संस्मरण)


दिल्ली शहर के जिस कमरे में मैं रहता हूँ, उसकी खिड़की से धान के लहलहाते खेत दीखते हैं और हर वक्त हलकी हवा के झोंके आते रहते हैं. आज भी हवा बह रही है, लेकिन उसमें खून की गंध मिली हुई है. उदास, बोझिल, बेबस और मुरझाई हुई हवा. खिड़की जिस तरफ खुलती है, उसी दिशा में, शायद कुछ मिनटों की दूरी वाले रास्ते  पर एक लड़की बेरहमी से मार दी गयी है. शांत और अँधेरे में नहीं, दिन दहाड़े और शोर-शराबे के बीच. मारने वाले कई नहीं थे, सिर्फ एक था और जब उस लड़की के जिस्म में सत्ताईस बार कैंची गोदी गयी, उस दरमियान सैकड़ो लोग वहां से गुज़र चुके थे.
हमारे यहाँ ‘गुज़र जाना’ एक शब्द है जिसके मायने होते हैं ‘मर जाना’.
लड़की मर गयी और लोग ‘गुज़र गए’.
बताने वाले बता रहे हैं कि हत्यारा अकेला था. हो सकता है दो रहे हों या फिर तीन या फिर दस. बहरहाल इस क़त्ल के लिए ज़िम्मेदार लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है की दुनिया की कोई दंड संहिता इसके लिए कोई सजा मुक़र्रर कर ही नहीं सकती. वह एक को पकड़कर जेल में डाल देगी लेकिन अरबों-खरबों इस बहाने हमेशा के लिए बेगुनाह घोषित कर दिए जायेंगे. उसे या उस जैसे हत्यारों को और बहुत सारी लड़कियों की हत्या करनी पड़ेगी. लड़की ने इनकार करने की सजा पाई है. लड़कियों के इनकार करने और मारे जाने के बीच का फासला दिनों—दिन कम होता जा रहा है. लड़कियां ऐसे ही इनकार करती रहेंगी लड़के ऐसे ही हत्या करते रहेंगे और लोग सैकड़ों की तादाद में सड़कों से ‘गुज़र’ रहे होंगे.
मुझे उस हत्यारे से कोई शिकायत नहीं है. मुझे शिकायत है उस लड़की से जो अब भी मेरी खिड़की के बाहर धान के लहलहाते खेतों के बीचो बीच अब भी खून से लथपथ खड़ी है. धान की सफ़ेद बालियाँ लाल हो रही हैं और उसपे मक्खियाँ भिनभिना रही हैं. वह लगातार रो रही है और खिड़की से झर रही हवा में नमक घुल गया है. मैं मक्खियों की भिनभिनाहट और हवा के खारेपन से घबराकर खिड़कियाँ बंद कर देता हूँ. वह उड़कर पास चली आती है और खिड़की के शीशे को खून से सने हाथों से लगातार पीटती रहती है.
मैंने आहिस्ता से खिड़की खोलकर अपनी दराज़ में से एक कैंची निकालकर लड़की को थमा दिया है. वह धान के खेत से निकलकर वापस उसी सड़क पर जाकर खड़ी हो गयी है, जहां उसकी हत्या हुई थी. वह बदहवास होकर अपनी हत्या करने वाले चेहरे को तलाश रही है लेकिन सभी चेहरे उसे एक से नज़र आ रहे हैं.

तुम (कविता)

मैंने सुना , अलगनी पर बैठी टिटिहरी से तुम्हारी आवाज़ नंगी चारपाई से उठकर , पीछे मुड़कर मैंने देखा मेरी पीठ पर उग आये तुम्हारी हथेलियों...