Friday, May 19, 2017

लघुकथा- कौन जात हैं ?

ये जो फोन पर बात कर रहे हैं, आपके दोस्त हैं ?
हाँ, यहीं पीएचडी में ऐडमीशन लिए हैं.
कौन जात हैं ?
ये कैसा सवाल है ?
बहुत नॉर्मल सवाल है भई ! बताइये इसमें अजीब क्या है ?
बात तो सही है लेकिन फिर भी.... ? ऐसे थोड़ी न होता है ?
क्यों नहीं होता है ? आज नहीं तो कल पता ही चलना है कि ये कौन जात हैं. तो कल का इंतज़ार क्यों करें ? इतना टाइम थोड़े है कि हम चार-छह दिन असमंजस में रहें. कोई न कोई जात के तो होंगे ही, जैसे मैं हूँ, जैसे तुम हो. इनका भी कन्फर्म हो जायेगा तो बाकी बहुत सारी चीजें आसानी से फिक्स हो जाएँगी. अब बता भी दो.
मैं नहीं बताऊंगा. खाली होंगे तो उन्हीं से पूछ लीजियेगा. मुझसे न हो पायेगा.
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अच्छा आप खाली हो गए ? आप ही बता दीजिये. आप कौन जात हैं ?
एक्सक्यूज मी ???? ये कैसा सवाल है ?

Wednesday, April 5, 2017

रामलला हम आयेंगे

रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीँ बनायेंगे
जे सरवा सिरि राम न बोली, पकड़ पकड़ लतियाएंगे
रामलला हम आयेंगे

पढ़े बदे इस्कूल ना रहै, घर चौका औ चूल्ह ना रहै
रोटी औ रोजगार ना रहै, कउनो कारोबार ना रहे
अपने खूब मलाई काटें, लम्बा-लम्बा भाषण छाँटैं
गाय-भईंस के नाम पे हरदम जनता को लड्वायेंगे
रामलला हम आयेंगे

अस्पताल, गोदाम अनाज के, एक्को नाही काम काज के
सरकारी स्कूल औ कॉलेज, उफरि परै सब नालेज-वालेज
दाल, तेल औ नून के कीमत, कोचिंग, टयूसन फीस के आफत
पइसा वालेन के का दिक्कत प्राइबेट में जायेंगे
रामलला हम आयेंगे

खाली हौवा ? झंडा लेला, हाथ में मोट के डंडा लेला
रोजगार के बात मत करा, सरऊ देसदरोही हउआ ?
आटा ना हौ, डाटा हौ नै, रोटी डाउनलोड कई लेहा
टच मोबाइल, टीबी, किरकेट, घर-घर में पहुचाएंगे
रामलला हम आयेंगे

गाँव गली में मंदिर होइहैं, चार ठे मोट पुजारी होइहैं
दुई ठे दिन भर रूपया गिनिहैं, औ दुई ठे रेचकारी बिनिहैं
ओही भब्य मंदिर के बहरे पच्चिस-तीस भिखारी होइहैं
तोहर कमाई खाइके बाबा तोहईं के गरियायेंगे
रामलला हम आयेंगे

पैदा चाहे कुछ ना करिहैं, नटई तक ले ठूँस के खइहें
जवन बची ऊ घर ले जईहैं, बेटवा अमरीका में पढ़इहैं
थोड़का दान औ पुन्न देखाई, बाकी पार्टी फंड में जाई
वो ही से हथियार खरीद के दंगा-मार करायेंगे.
रामलला हम आयेंगे

गंगा माई, देंय दोहाई, कइसे होई साफ़ सफाई
चार ठे नाला और गिरी तब नेता दीहैं बजट बढ़ाई
पंडन के गजबै लीला हौ, हमरे नाम पे करैं कमाई
लाखों टन लकड़ी रोज फूँकिहैं, मुर्दा वहीँ जलाएंगे
रामलला हम आयेंगे

कोका-कोला, पेप्सी माज़ा, जवन मिलै बस गटक जा राजा
पोखरी कूँआ, ताल-तलैया, सुखति हवे तो सुखे दा भइया
काहें हाहाकार ? बिकत बा, पानी खाली बीस रुपैया
हवा त अबहीं बकिये बाटे, उसको भी बेचवायेंगे
रामलला हम आयेंगे

जनरल डिब्बा में ठुंस-ठुंस के, आड़े तिरछे कइसौ घुस के
दिल्ली-बम्मई भाग के जइहैं, पूरी जिनगी बेचि के अइहें
ई बिकास के कइसन सीढ़ी, भै बरबाद पचीसन पीढ़ी
तोहरे खून पसीना से ऊ आपन महल बनायेंगे
रामलला हम आयेंगे

रोटी-बेटी, नात-हीत में जतिये एक कसौटी होलै
दुनिया में इंसान, इहाँ पे चमरौटी बभनौटी होलै
पाँड़े बोलैं ठाकुरसाहब ! तोहँऊ हिन्दू हमहू हिन्दू
देखिहा अब थोडके दिन में हम बिस्वगुरु बन जायेंगे
रामलला हम आएंगे

छोटजतिया सब पढ़ि लिख जइहैं, धरम करम के आँख देखइहें
बड़जातियन के खेत फैक्टरी फिर कब्भौं ना झांकें जइहैं
अपने काम क छाँट के रक्खा, बाकी सबके बाँट के रक्खा
एनके बस मजदूर बनावा, नहीं त सब बढ़ जायेंगे.
रामलला हम आयेंगे

एही देस में लाख-करोड़ों आधे पेट ले खाना खालैं
एही मुलुक में रोज हजारन टीबी कैंसर से मरि जालैं
मछरी माँस पे फाँसी होई, दुनियाँ भर में हाँसी होई
बीड़ी, सिगरेट, गुटखा दारू बंद नहीं करवाएंगे
रामलला हम आयेंगे

05.04.2017

Tuesday, April 4, 2017

जन गण मन अधिनायक जय हे

जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता है
रामबरन खिसिया के बोले ठेहुना बहुत पिराता है
रतिया भर सब मच्छर काटैं, देख बहुत खजुआता है

पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
बेटवा-बिटिया पढ़ी न पवलैं, हाथ रहै कुछ तंग
फुलदेबिया के फालिस मरलै, हिलल-डुलल सब बंद

बिन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग
सुरजू दारु पी के कल्हियां रहनै नंग-धड़ंग
बौ मरलै कोतवलवा सरवा, बाटै बहुत दबंग

तव शुभ नामे जागे, ससुरा हमसे पईसा माँगे
तव शुभ आशिष मांगे, देखा तनिकौ सरम न लागे

जनगणमंगल दायक जय हे भारत भाग्य विधाता है.
तुम तो पढ़े लिखे हो बचवा तुमको तो सब आता है.
मंत्री जी का हेलीकप्टर तेल कहाँ भरवाता है ?

04.04.2017

Monday, April 3, 2017

ये जो सहराओं में भी गुल खिले हैं

ये जो सहराओं में भी गुल खिले हैं
मेरी मासूमियत के हौसले हैं
ये दुश्वारी मुझे रोकेगी कितना
है ज़िद चलने की फिर क्या आबले* हैं
बहुत कुछ मेरी झोली में है देखो
इरादे हैं, सफ़र है, मंजिले हैं
चलो चलकर नयी दुनिया बसायें 
तसव्वुर, कारवाँ है, काफिले हैं
फलक पसरा है पेशानी के ऊपर
ज़मीं भी अपने पावों के तले है
वहाँ घर मत बनाओ, मान जाओ
परिंदों के वहाँ पर घोंसले हैं 
सियासतदाँ के वादे, माशाल्लाह
हज़ारों हैं, मगर सब खोखले हैं 
पहाड़ों की तरह दिखते हैं जो भी
ज़रा सा छू के देखो, पिलपिले हैं
मैं जिनसे थरथराता था वे सारे
फखत पानी के छोटे बुलबुले हैं
हमारी कब्र के ऊपर मुसलसल
तुम्हारे मह्ल, गुम्बद, और किले हैं
हैं जब ख़ामोश, तो ताज़ा हवा हैं
मगर नाराज़ हैं तो जलजले हैं
मैं हूँ मैं, तुम हो तुम और वो तो वो है
लिहाज़ा इतने सारे फासले हैं
वो जो मुझ पर हुकूमत कर रहे हैं
मेरी नाकामियों के सिलसिले हैं


03.04.2017

कितनी है यह फ़ानी दुनिया

आनी दुनियाँ, जानी दुनियाँ
कितनी है यह फ़ानी दुनिया
कभी तो अपनी लगती है फिर
लगती है बेगानी दुनियाँ
बाहर कितना बड़ा शहर, और
भीतर से वीरानी दुनियाँ
साँच कहो तो आँच लगे, बस
झूठ कहे पतियानी दुनियाँ
हम वैसे के वैसे रह गए 
दिन-दिन हुई सयानी दुनियाँ
रिश्तों के अम्बार लगें जब
अम्मा, दादी, नानी दुनियाँ
सबकुछ कितना टूट गया है
गज़ब की खींचातानी दुनियाँ
बचपन में लगती थी हमको
दूध भात सी सानी दुनियाँ
दिल का दरिया सूख गया अब
बचा आँख का पानी दुनियाँ
जीवन जीने के चक्कर में 
हुई तेल की घानी दुनियाँ
व्यंग्य, चुटकुला, नाटक-प्रहसन
कविता ग़ज़ल कहानी दुनियाँ


31.03.2017

Wednesday, July 22, 2015

एक सुन्दर अफ़साना माँ

चिड़िया, बादल, तितली, बारिश
एक सुन्दर अफ़साना माँ
नींद में बिस्तर, प्यास में पानी,
भूख में दाना-दाना माँ

सपनों की बुनियाद के तले,
घर में गड़ा खज़ाना माँ
खिड़की, आँगन, छत, दीवारें,
छप्पर, ताना-बाना माँ

मैं जब नन्हा था तो कैसा
दिखता था, क्या करता था
चलनी, सूप किनारे रख
आ बैठ ज़रा बतिया ना माँ

कान पकड़ स्कूल ले गयी
सर्दी, बारिश या गर्मी
तुम क्यों इतनी निष्ठुर थी तब
अब मैंने ये जाना माँ

बाबूजी की चिट्ठी पढ़कर
तुम इतना क्यूँ रोती थी
तब तो बिलकुल बच्चा था मैं
अब तो कुछ बतला ना माँ

मेले में खो गया था मैं तो
तुम कितना घबराई थी
आ मैं तेरा हाथ पकड़ लूँ,
बिलकुल मत घबराना माँ


21.07.2015

Tuesday, July 21, 2015

सोचता हूँ कि मुसलसल लिख दूँ

आज लिक्खूं या चाहे कल लिख दूँ
सोचता हूँ कि मुसलसल लिख दूँ

रात भर जागता रहा हूँ मैं
क्यूँ न ऐसा करूँ ग़ज़ल लिख दूँ

उदास बैठा है इक खानाबदोश
उसके सपनों में एक महल लिख दूँ

यूँ करूँ जिंदगी के पन्नों पर
हर कठिन की जगह सरल लिख दूँ

ठूँठ पेड़ों को हरा फल लिख दूँ
उड़ रही रेत को दलदल लिख दूँ

झील में खून के निशान मिले
हुक्म आया है मैं कमल लिख दूँ

क्यों न इन रहबरों की बस्ती को
लखनऊ, दिल्ली को जंगल लिख दूँ

इमारतों को करके नेस्तानाबूद

कुदाल, फावड़ा और हल लिख दूँ