ये जो सहराओं में भी गुल खिले हैं
कितनी है यह फ़ानी दुनिया
एक सुन्दर अफ़साना माँ
सोचता हूँ कि मुसलसल लिख दूँ
कुछ टूटता रहता है हमेशा मेरे अंदर
जो मेरे दिल में था अबतक अधूरी दास्ताँ बनकर
सूनी रात के हासिल