नदी किनारे घाट की सबसे निचली सीढियों पर बैठे हुए दोनों बिखरे हुए कंकड़ बीन-बीन कर पानी में फेंकते रहे , लेकिन घंटो तक बोला कोई नहीं. पानी में कंकड़ गिरने के बाद ‘ घुप्प ’ की आवाज़ होती और ख़ामोशी की लय थोड़ी देर के लिए टूट जाती. सूरज डूबने को हो आया. बढ़ी हुई नदी की लहरों सा एक शोर दोनों का अन्दर भी था. कहने को बहुत कुछ था, लेकिन शब्द नहीं थे. युनिवर्सिटी कैम्पस के मेन गेट से दोनों साथ चले थे. सीढियों पर कोई ठीक-ठाक सी जगह देख कर बैठने तक चुपचाप , ख़ामोशी की एक लकीर दोनों के क़दमों के साथ खिंची चली आई थी. कोई बच्चा सीढ़ियों से दौड़ते हुए आया और …
दुनिया का तमाशा है ये हसरत तो नहीं थी चुपचाप देखना पड़ा आदत तो नहीं थी जो मिल न सका ज़िन्दगी में ख़्वाब ही तो था जो मिल गया था , वो भी हक़ीकत तो नहीं थी इस ज़हनोदिल में भर गया है शहर का धुआं कुछ साल पहले ऐसी तबीयत तो नहीं थी बीमार हुए , घर का पता याद आ गया चल कर के देखते हैं , अदावत तो नहीं थी तुम, तुम ही रहे उम्र भर मैं, मैं ही रह गया कुछ भी था जानेजाँ ये मुहब्बत तो नहीं थी
हर मुश्किल का हल बन जाये आज नहीं तो कल बन जाये दिन भर की ये दुनियादारी आधी रात गजल बन जाये मैं तो भँवरा बन जाऊँगा बस तूँ भी गुड़हल बन जाये प्यार की खुशबू हौले-हौले महक उठे संदल बन जाये ख़्वाहिश एक नन्ही बगिया है हवस बने , जंगल बन जाये जितने पत्थर बरसे मुझपर तह कर दें तो महल बन जाए
ये दुनिया इक ख़्वाब सही मंज़र भी तो है और यही दुनिया महबूब का घर भी तो है सात समंदर जितनी गहरी आँखें उसकी सात पहाड़ों जैसा सख़्त जिगर भी तो है मरना उतना बुरा नहीं , मर जाना ही है खुद को मरता देख न लें ये डर भी तो है मैं मंज़िल के ख़्वाब सुनहरे देख रहा था याद आया कि इक वीरान सफ़र भी तो है पीर-फ़कीरों की सब बातें ठीक हैं लेकिन रूह के बाहर जिस्म भी है इक सर भी तो है नदी , समंदर , पहाड़ , पर्वत , जंगल , सहरा कुछ हिस्सा बाहर है कुछ अंदर भी तो है
सन 2009-10 की बात है। उस समय तक इन्टरनेट तक हमारी पहुँच बहुत सीमित थी। बीस रुपये प्रति घंटे की दर से इन्टरनेट कैफे में ऑर्कुट पर एकाउंट बनवा कर इन्टरनेशनल हो जाने का अपना सुख था। गूगल और यूट्यूब कानों के लिए परिचित शब्द जैसा लगने लगा था। फेसबुक के बारे में सुना तो हंसी आई थी , और उसके साथ करना क्या है , नहीं पता था। उस वक्त बीएचयू के एक सीनियर दोस्त बड़े शायरों की कुछ सीडियाँ रखे हुये थे। शायरी के प्रति उस दोस्त की दीवानगी मुझे आज भी बहुत गुदगुदा जाती है। उस समय के नामचीन शायरों को सुनकर पता नहीं क्या हो जाता था। एक शाम खबर मिली कि बीएचयू क…

Writer, Assistant Professor, Hindi Department, Central University of Jharkhand, Ranchi
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