इस बीच ऐसा क्या हो गया कि उसका किसी काम में मन ही नहीं लगता। देर तक बनिए की तरह किसी कागज़ पर कुछ कामों की लिस्ट बनाता, मिटाता, फिर सबकुछ झटक कर आँखों में चुभते टेबल लैम्प को बुझाता और कम्बल ओढ़ लेता। क्या किताबों ने उसके अंदर से सबकुछ खुरचकर बाहर निकाल दिया है ? क्या संगीत की स्वरलिपियों, आलापों, तानों और मुरकियों ने दिमाग की अंतड़ियों से सारा कुछ निचोड़ लिया है ? क्या कोई भी ऐसी वजह नहीं जिसके लिए जीने का एक लम्बा टाइम टेबल बनाया जा सके ? वह एक तिनका तलाश रहा था ताकि खुद को अथाह समुंदर में डूबने से बचा सके। उसने बहुत दिनों तक अपने नाम के आगे…
गणित के टीचर ने क्लास में बहुत विस्मयकारी तरीके से शून्य में देखते हुए कहा था “ कल साल 2020 आ रहा है। जब साल 2000 आया था, मेरे लिए यह किसी जादू की तरह था। मैंने उसी के आस-पास इस स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था। इकहत्तर की पैदाइश और नब्बे की जवानी के दिनों में हम बात करते थे कि एक दिन ऐसा आयेगा जिसे हम साल 2000 कहेंगे। उस रात घडी की सुई ने जैसे ही बारह की संख्या पार की, हमने एक नयी सदी में पैर रख दिया था। और उस बात को आज बीस साल हो गए। कितना कमाल लगता है सबकुछ !” क्लास के सारे बच्चे मुंह बाए टीचर को देख रहे थे। ऐसा पहली दफा हुआ था जब टीचर ने …
मोबाईल के मैसेज की बीप बहुत ही धीमी थी। रात के सन्नाटे और अँधेरे से कसे हुए कमरे में मद्धिम सी आवाज़ और रोशनी ही उसे जगाने के लिए काफी थी। यह दो किश्तों की गहरी नीद का छोटा सा अंतराल था। बहुत मासूम और कोमल। यह करवट बदलने और उँगलियों के चटखने का समय होता है। बाहर ओस की बूंदों की टिप-टिप सुनाई दे रही थी। बंद पलकों के अन्दर दो पुतलियाँ कसमसाईं। उन्होंने बहुत आहिस्ता से बाहर झाँका जैसे हम किसी सुनसान और निर्जन हवेली में घुसने से पहले दरवाजे की फांकों से अंदर झाँकते हैं। उसने आदतन मोबाईल के टचपैड पर ऊँगली रखी और टोकरी भर उजाला कमरे में तैर गया…
1- सुबह का सपना जिस वक्त मैं अपनी पूरी ताकत से भागता हुआ स्ट्रेचर के पास पहुँचा , पिता दुनिया से जा चुके थे. उनकी आँखे और मुँह खुले हुए थे. आखिरी वक्त में उन्होंने पेशाब कर दिया था जिससे उनपर डाली गयी चादर भीग गयी थी. मैं रोया नहीं , रोने की कोई वजह भी नहीं थी. लगातार तीन दिन और रात से उन्हें पल-पल मरते देख मेरे अंदर का एक कोना पहले ही मर चुका था. उलटे मुझे एक अजीब तरह का सुकून मिला , मैंने उनके चेहरे को छूते हुए , उनकी आँखों को बंद किया और अनायास ही मेरे अन्दर कोई बुदबुदाया “ ओह पिता ! अब तुम आज़ाद हो , तुम्हें तकलीफ से निजात मिल गय…

Writer, Assistant Professor, Hindi Department, Central University of Jharkhand, Ranchi
Let's Get Connected:- Twitter | Facebook | Google Plus | Linkedin | Pinterest
Social Plugin