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फिजाँ का रंग गहरा हो गया है
इक दर्द था जो दिल को लुभाता ही रह गया
हाथ में ख़ून लगा खंज़र है
वही दुनिया को सम्हाले हुये हैं
तूं मेरे जीने का सबब है
कोई रिश्ता हो कुछ भी हो
औरों पे है इलज़ाम लगाने को बहुत कुछ
अलहदा दिखती है जिस राहगुजर से देखा
ये क्या कि अपने ही हाथों अपनी तमाम रातें अज़ाब कर लूँ
कालापन तहखानों में और पूरा सच बाज़ार के पीछे
ये दुनिया इक ख़्वाब सही...
बारिश की तरह अब्र से झर लूँ तो फिर चलूँ
तूं पत्थर तो नहीं है फिर पिघलता क्यों नहीं मुझसे