फ़िजाँ का रंग गहरा हो गया है तेरी यादों का पहरा हो गया है हवाएँ खिलखिला कर बह रही हैं ये मौसम भी सुनहरा हो गया है मैं तुझको बादलों में ढूँढता हूँ ये चाँद अब तेरा चेहरा हो गया है ये दुनिया मुझको जादू लग रही है मैं तेरा और तूँ मेरा हो गया है
इक दर्द था जो दिल को लुभाता ही रह गया वो आ न सका और मैं बुलाता ही रह गया वेटिंग , कभी बिज़ी तो कभी नॉट रीचेबल मैं ज़िंदगी को फोन लगाता ही रह गया दुख दर्द तो लपक के गले से लिपट गए सुख दूर खड़ा हाथ हिलाता ही रह गया कुछ वक़्त मेरा उलझनों के साथ कट गया कुछ किश्त सुलझनों की चुकाता ही रह गया मुझमें , मेरी पहुँच से बहुत दूर , बेअदब इक शख़्स था जो मुझको सताता ही रह गया बन-बन के टूटते रहे शीशा-ए-दिल के ख़्वाब शीशागरी के इल्म जुटाता ही रह गया
हाथ में ख़ून लगा खंज़र है कह तो रहा है चारागर है ! चाँद सितारे बाँट रहा है पाँव के नीचे मुरदाघर है क्या तक़रीर है माशाअल्लाह अद्भुत ताल है अद्भुत स्वर है नए चलन का बैरागी है महल में रहता है बेघर है एक कहानी फिर से गढ़ ली पिछली भी पुरज़ोर असर है
वही दुनिया को सम्हाले हुए हैं बड़ा सस्ता भरम पाले हुये हैं ये बच्चे हैं , फुदकने दो इन्हे भी ज़रा सी पी के मतवाले हुए हैं जहाँ तक तख़्त की खुशबू बिछी है वहाँ तक गोटियाँ डाले हुए है हुज़ूर एक आध फ़रमाइश तो करिए ये हर एक रंग में ढाले हुए हैं हमें दुनिया की फ़ितरत मत सिखाओ हमारे हाथ भी काले हुए हैं हज़ारों बार दिल टूटा हुआ है हज़ारों चाहने वाले हुए हैं जो फ़न , जो शौक मीठी सी चुभन थे वही अब रूह के छाले हुए हैं
तूँ मेरे जीने का सबब है बाकी सबकुछ बेमतलब है तुझसे पहले , बाद में तेरे ना कुछ तब था , ना कुछ अब है तेरी दीद बिना सब सूना कैसा नशा है , कैसी तलब है सबके अपने-अपने ग़म हैं पर मेरी तकलीफ़ अलग है दिल के दाग़ दिखाऊं किसको मेरा क़ातिल ही मेरा रब है इश्क़ मजाज़ी , इश्क़ हकीकी जो भी है ये खेल गज़ब है
कोई रिश्ता हो कुछ भी हो हमेशा याद रखना है जिसे अपना बनाना है उसे आज़ाद रखना है मुहब्बत में वफ़ा और बेवफाई कुछ नहीं होती तेरा हिस्सा है जितना बस वही आबाद रखना है क़यामत तक का वादा, कम ज़ियादा और तकाजा क्या तू मुझको याद है उतना कि जितना याद रखना है अभी बस तुम हो मैं हूँ इश्क से लबरेज़ दो दिल हैं हमारे बाद जो होगा हमारे बाद रखना है
कहने को बहुत कुछ है सुनाने को बहुत कुछ पाने को कुछ नहीं है गँवाने को बहुत कुछ ख़ुद के लिए दो वक्त की फुरसत तो नहीं है औरों पे है इलज़ाम लगाने को बहुत कुछ जो कह दिया उन्होंने वही आख़िरी सच था अब और क्या बचा है बताने को बहुत कुछ तक़रीर तो ऐसी कि कलेजा निकाल दे पर ज़हनियत है नोचने-खाने को बहुत कुछ वैसे तो क़यामत का सफ़र दूर नहीं पर अब भी बचा है बचने-बचाने को बहुत कुछ
अलहदा दिखती है जिस राहगुजर से देखा मैंने दुनिया को किसी और नज़र से देखा उसने मुझसे मेरी गिरहों की चाभियाँ ले लीं फिर मुझे खोलकर जो चाहा , जिधर से देखा मसअला यूँ तो शराफत से निपट सकता था मैं जहां पर था , कहाँ तुमने उधर से देखा मैंने मंज़िल से तो सीखा है ठहरने का सबक मैंने बेचैन निगाहों को सफर से देखा
ये क्या कि अपने ही हाथों अपनी, तमाम रातें अज़ाब कर लूँ कलम उठाऊँ , गजल लिखूँ और थोड़े कागज़ खराब कर लूँ मैं नींद बिस्तर से झाड़कर के, सजा के तकिये के नीचे रख दूँ और अपनी बोझिल उनींदा आँखें, मसल-मसल कर चराग कर लूँ अगर हक़ीक़त यही है तो फिर तिलिस्म क्या है, फरेब क्या है ? तो मैं भी पत्थर को पानी करके, उसे बदल कर शराब कर लूँ फरिश्ते आए हैं मुझको लेने, मगर ज़रा सा ठहरना होगा चलूँगा, चलना तो है ही, बैठो, सबर तो रक्खो हिसाब कर लूँ
बच्चे जैसा चीख रहा था इक बूढ़ा दीवार के पीछे जैसे कश्ती डूब रही हो लहरों की मंझधार के पीछे उजली-उजली चमकीली चीजें थीं सजी दुकानों पर कालापन तहखानों में और पूरा सच बाज़ार के पीछे नहा के खाके धूप में बैठ के पूरा दिन बतियायेगा पूरा हफ़्ता बैल बना था हरखू इक इतवार के पीछे किसको फुरसत अब्बू का टूटा चश्मा बनवाये कौन अब्बू , जिनकी आँखें धँस गयीं एक इसी परिवार के पीछे डिग्री बाँध के सीने पर मोहना पंखे से झूल गया लड़की का चक्कर था कोई खबर छपी अखबार के पीछे
ये दुनिया इक ख़्वाब सही मंज़र भी तो है और यही दुनिया महबूब का घर भी तो है सात समंदर जितनी गहरी आँखें उसकी सात पहाड़ों जैसा सख़्त जिगर भी तो है मरना उतना बुरा नहीं , मर जाना ही है खुद को मरता देख न लें ये डर भी तो है मैं मंज़िल के ख़्वाब सुनहरे देख रहा था याद आया कि इक वीरान सफ़र भी तो है पीर-फ़कीरों की सब बातें ठीक हैं लेकिन रूह के बाहर जिस्म भी है इक सर भी तो है नदी , समंदर , पहाड़ , पर्वत , जंगल , सहरा कुछ हिस्सा बाहर है कुछ अंदर भी तो है
बारिश की तरह अब्र से झर लूँ तो फिर चलूँ शबनम सा ज़मीनों पे बिखर लूँ तो फिर चलूँ गीले लजीज़ लम्हे बहुत बेशकीमती ठहरो ज़रा सा आँख में भर लूँ तो फिर चलूँ हिज़रत में मुसलसल है अंधेरों के बयाबाँ कुछ रोशनी के पंख कुतर लूँ तो फिर चलूँ दरिया से बहक जाने हवाओं से महकने का सहरा से तिश्निगी का हुनर लूँ तो फिर चलूँ दुश्वारियों ने सोख लिया ज़िन्दगी का ताब तुमको गले लगा के निखर लूँ तो फिर चलूँ बस्ती से आ रहा किसी के चीखने का शोर बेबस ही सही फिर भी सिहर लूँ तो …
तूं पत्थर तो नहीं है फिर पिघलता क्यों नहीं मुझसे यहीं दिल्ली में रहता है तो मिलता क्यों नहीं मुझसे फकीरों की तरह अपनी ही धुन में मस्त रहता है अज़ब इन्सान है आखिर ये जलता क्यों नहीं मुझसे ज़माने की मसीहाई थमा के मत जा मुझको सुन मैं हैराँ हूँ कि मैं ही खुद सम्हलता क्यों नहीं मुझसे मेरी ख्वाहिश के तहखानों में लाखों रंग बिखरे हैं तेरी सूरत में फिर भ...

Writer, Assistant Professor, Hindi Department, Central University of Jharkhand, Ranchi
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